- संदीप पाण्डेय
मुंबइया सिनेमा में जब कोई नया फॉर्मूला सफल होता है तो उसे भुनाने के लिए पूरे फिल्म जगत में एक होड़ सी लग जाती है। चाहे वह सत्तर के दशक में डाकुओं पर आधारित फिल्में हों या अस्सी के दशक में समाज में फैली अराजकता के खिलाफ आवाज उठाने वाले ‘एंग्री यंग मैन’ के किरदार पर, इन विषयों पर लगातार एक ही जैसी कई फिल्में सिनेमा के परदे पर आईं और तब तक आती रहीं जब तक दर्शकों ने उन्हें नकार नहीं दिया। मौजूदा दौर में भी एक जैसे विषय पर आधारित पुलिसिया एक्शन फिल्मों का एक सिलसिला चल निकला है, जो अभिनव सिंह कश्यक की ‘दबंग’ से शुरू हुआ और फिर ‘सिंघम’, ‘राउडी राठौड़’, ‘जिला गाजियाबाद’,‘दबंग’ दो’ और ‘पुलिसगीरी’ तक बदस्तूर जारी है। इस शुक्रवार रिलीज हुई अपूर्व लाखिया की फिल्म ‘जंजीर’ भी इसी श्रंखला की अगली कड़ी प्रतीत होती है।
फिल्म का नाम ‘जंजीर’ है इसलिए 1973 में बनी अमिताभ बच्चन की ‘जंजीर’ से इसकी तुलना होना लाजिमी है। फिल्म के निर्देशक लाखिया ने भी अपनी इस ‘जंजीर’ को पुरानी का रीमेक बताकर ही रिलीज किया है, लेकिन लगता है यही बात उनकी फिल्म पर भारी पड़ गई है। सलीम-जावेद की लिखी ‘जंजीर’ में जबरन कुछ नया ठूंसने की चाहत ने फिल्म का कबाड़ा कर दिया है। पुरानी और नई कहानी में तालमेल बिठाने में कुछ दृश्य ऐसे बन पड़े हैं जो फिल्म में न होते तो भी कहानी पर कोई असर न पड़ता। सुरेश नायर और अपूर्व लाखिया की लिखी पटकथा इतनी कमजोर है कि फिल्म के कई दृश्यों का कोई मतलब ही नहीं निकलता और दर्शक सिर खुजाने पर मजबूर हो जाता है।
फिल्म की कहानी एक तेज तर्रार पुलिस अधिकारी विजय खन्ना (राम चरन) के किरदार पर केंद्रित है, जो मुंबई के तेल माफिया तेजा (प्रकाश राज) के काले कारोबार को खत्म करने के लिए जंग छेड़ता है। सियासी गलियारों में ऊंची पहुंच रखने वाला तेजा विजय खन्ना को सस्पेंड करा देता है। इस मुश्किल समय में विजय की मदद शेरखान(संजय दत्त) करता है और फिर दोनों मिलकर तेजा के काले साम्राज्य का खात्मा कर देते हैं।
पुरानी ‘जंजीर’ में पुलिस अधिकारी का जो किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया था, उस किरदार में केंद्रीय मंत्री चिरंजीवी के बेटे राम चरन ने ठीकठाक अभिनय किया है। यह उनकी बॉलीवुड में पहली फिल्म भी है। हालांकि शेरखान की भूमिका में संजय दत्त के पास बेवजह के मारधाड़ करने के कुछ दृश्यों के अलावा करने को कुछ खास था ही नहीं। एक एनआरआइ महिला के किरदार में प्रियंका चोपड़ा भी कुछ खास असरदार नहीं दिखीं। वहीं, सिंघम से दर्शकों के चहेते खलनायक बने प्रकाश राज लगातार एक ही तरह की भूमिकाएं कर रहे हैं, जो उनके करियर के लिए घातक हो सकता है। हालांकि, एक समझदार रिपोर्टर की भूमिका में अतुल कुलकर्णी ने एक बार फिर प्रभावित किया है। फिल्म का संगीत औसत दर्जे का है। दर्शकों की नब्ज भांपते हुए फिल्म के निर्देशक ने एक नहीं बल्कि दो-दो आइटम नंबर ‘पैसे वालों की है पिंकी’ और ‘शकीला बानो’ शामिल किए हैं। दोनों ही प्रभावी बन पड़े हैं। बैक ग्राउंड में गांधी जी के भजन ‘रघुपति राघव राजा राम’ का कई जगह इस्तेमाल किया गया है, जो फिल्म की थीम से तालमेल नहीं बिठा पाता और निष्प्रभावी लगता है।
- लेखक "संदीप पाण्डेय " आगरा के युवा पत्रकार है |
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